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रायपुर। देश 72वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है। स्वतंत्रता का मतलब सिर्फ देश की आजादी नहीं, बल्कि दीनता के बोध से आजादी भी है। देखने-सुनने में असमर्थ छत्तीसगढ़ की दिव्यांग वृद्धा टेटकी बाई देवांगन देश के लिए रोल मॉडल बन गई हैं। दीनता और असमर्थता के बोध से स्वतंत्र होकर टेटकी ने एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत कर दिखाया है। ताकि न बनें दूसरों पर बोझ बेमेतरा जिले की नवागढ़ पंचायत के तोरा गांव की 72 वर्षीय टेटकी बाई बेहद गरीब होने के साथ ही दिव्यांग भी हैं। देख-सुन नहीं सकतीं, लेकिन निराश्रित-विधवा पेंशन की राशि से पाई-पाई जोड़कर अपनी झोपड़ी के बगल में ही शौचालय बनवा डाला, ताकि दूसरों पर बोझ न बनें।
::/introtext::मजदूरी भी करनी पड़ी
24 वर्षीय नाती मालिकराम ही एकमात्र सहारा है, जो मेहनत-मजदूरी कर घर चलाता है। ऐसे में शौचालय का खर्च वहन करना मुश्किल था। टेटकी बाई बताती हैं कि वर्ष 2011 में गरीबी रेखा सर्वेक्षण सूची में उनका नाम नहीं आया। इस कारण शौचालय बनाने के लिए शासन से एक पैसे की भी सहायता राशि नहीं मिल पाई। इसके बाद उन्होंने निराश्रित व विधवा पेंशन की राशि में से कुछ रकम जमा करनी शुरू की। पाईपाई जोड़कर अंतत: शौचालय बनवाने लगीं तो रकम कम पड़ गई। ऐसे में नाती के साथ मिलकर स्वयं मजदूरी की तब कहीं जाकर शौचालय तैयार करने लायक रुपए जुट सके।
भूखे पेट रहना पड़ा
टेटकी बाई अपनी स्वर्गवासी बेटी बबली के पुत्र मालिकराम के साथ आज भी तंगहाली में ही जी रही हैं। बबली भी दृष्टिबाधित थी, जिसने 18 साल पहले दुनिया छोड़ दी। मजदूरी कर रहा मालिकराम बताता है कि शौचालय बनवाने के लिए रुपए जमा करने के दौरान कई दिन खाने में सब्जी नहीं बन पाती थी। बहुत हाथ बटोरकर चलना पड़ा, कभी-कभी केवल सरकारी चावल उबालकर ही पेट भर लेते थे। गरीबी के कारण पढ़ नहीं सके। आज भी मजदूरी न करें तो खाना न बने। संतोष है कि नानी को अब शौच आदि के लिए किसी पर आश्रित नहीं रहना पड़ता है।
नहीं मिल सका था योजना का लाभ
आर्थिक सर्वेक्षण में खामी के चलते पात्रता बावजूद टेटकी बाई को स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत योजना का लाभ नहीं मिल सका था। इस बीच, उनकी फरियाद वंचित ग्रामीणों के हक के लिए सक्रिय स्वयंसेवी संस्था जनसुनवाई फाउंडेशन तक पहुंची। फाउंडेशन के राज्य समन्वयक संजय कुमार मिश्रा बताते हैं, तब तक टेटकी कामचलाऊ शौचालय बनवा चुकी थीं।
संस्था ने उन्हें गांव वालों की उपस्थिति में सम्मानित किया तो पूरे क्षेत्र में इसकी गजब प्रतिक्रिया हुई। लोगों ने भी घरों में शौचालय बनवाने शुरू कर दिए। संस्था द्वारा की गई पैरवी के बाद टेटकी को प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना का लाभ मिल सका। संजय बताते हैं, अब टेटकी का पक्का मकान भी तैयार हो गया है, लेकिन 2011 की आर्थिक सर्वे सूची में खामी के चलते कई गरीब परिवार वंचित हैं, बावजूद इसके कई गांव ओडीएफ घोषित कर दिए गए हैं।
शासन ने स्वच्छता दूत के रूप में टेटकी बाई का चयन किया और 15 अगस्त 2017 को लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने भी बेमेतरा आकर टेटकी बाई को सम्मानित किया। टेटकी बाई को पूरा गांव अम्मा कहकर बुलाता है। गांव की देवमती, सतरूपा व फेकन कहती हैं कि अम्मा ने शौचालय बनाकर पूरे गांव की आंखें खोल दीं।
कतना दिन माई लोगन जाही बाहिर...
टेटकी बाई छत्तीसगढ़ी बोली में कहती हैं, माई लोगन कतना दिन बाहिर जाही। बहु-बेटी के इज्जत बर सबो झन ला सोचना चही। शौचालय अब्बड़ जरूरी हे। एकर से गांव मा सफई घलो रही। बीमारी नई होही...।
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