यौन शोषण की शिकार हुई सभी बच्चियां 18 साल से कम उम्र की हैं, शेल्टर होम में रहने वाली 44 में से 34 बच्चियों के साथ रेप की पुष्टी हुई है.....
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मुज़फ्फरपुर शेल्टर होम में यौन शोषण की शिकार हुई सभी बच्चियां 18 साल से कम उम्र की हैं. TISS की रिपोर्ट से साफ पता चलता है कि मुजफ्फरपुर शेल्टर होम में हुई हैवानियत में चाइल्ड वेलफेयर कमिटी के सदस्य और संगठन के प्रमुख भी शामिल थे.
बिहार के मुज़फ्फरपुर शेल्टर होम केस में रोज़ नए-नए खुलासे हो रहे हैं. पीड़ित बच्चियों ने बताया कि कैसे 'हंटरवाले अंकल' और 'नेता जी' ने उनके साथ 'गंदा काम' किया था. साहू रोड पर स्थित शेल्टर होम में रहने वाली 44 में से 34 बच्चियों के साथ रेप की पुष्टी हुई है. यह पूरा मामला तब प्रकाश में आया, जब टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस (TISS) की ऑडिट रिपोर्ट आई. ये रिपोर्ट 31 मई को बिहार सरकार को सौंपी गई. रिपोर्ट में बच्चियों से दरिंदगी के अलावा ये बात भी सामने आई कि कैसे ये शेल्टर होम हैवानों के लिए स्वर्ग बनते जा रहे हैं.
TISS ने 7 महीनों तक 38 जिलों के 110 संस्थानों का सर्वे किया था. TISS के डायरेक्टर तारीक ने बताया कि ये सर्वे उनके फील्ड प्रोजेक्ट 'कोशिश' का एक हिस्सा था. सर्वे खत्म होने के बाद चौंकाने वाली रिपोर्ट आई. यौन शोषण की शिकार हुई सभी बच्चियां 18 साल से कम उम्र की हैं. इनमें भी ज्यादातर की उम्र 13 से 14 साल के बीच है. इस रिपोर्ट से साफ पता चलता है कि मुजफ्फरपुर शेल्टर होम में हुए हैवानियत में चाइल्ड वेलफेयर कमिटी के सदस्य और संगठन के प्रमुख भी शामिल थे.
सर्वे का नाम: 'ग्रेव कंसर्न' (गंभीर चिंता)
'शोषण'... ये एक ऐसा मुद्दा है, जिससे तकरीबन हर ऑर्गनाइजेशन, इंस्टिट्यूट या काम करने की जगह में हम कभी न कभी दो-चार हो चुके होते हैं. हालांकि, कुछ ऐसे ऑर्गनाइजेशन भी हैं, जो हमेशा से ही शोषण के खिलाफ खड़े रहे हैं. परंपरा से बंधे हमारे समाज में लड़कियों और महिलाओं को आज भी एक 'वस्तु' के रूप में देखा जाता है. दुख की बात है कि बच्चों से संबंधित कानून सिर्फ संगठित क्षेत्रों के लिए बने हैं. अनौपचारिक क्षेत्र आज भी उनसे बचे हुए हैं. जुविनाइल जस्टिस एक्ट के जरिये हम चाहे कितना भी यौन शोषण पर लगाम लगाने की कोशिश करें, लेकिन कहीं न कहीं नाकाम हो ही जाते हैं. मुज़फ्फरनगर शेल्टर होम में कुछ ऐसा ही हो रहा था. तारीक बताते हैं, 'इस शेल्टर होम में बच्चियों को उनके वार्ड में एक तरह से लॉक करके रखा जाता था. सिर्फ बाथरूम और डाइनिंग हॉल के अलावा उन्हें और कहीं जाने की इजाजत नहीं थी.'
पटना के एक शेल्टर होम में बिताए गए कुछ वक्त
एक साल पहले यहां एक लड़की ने खुदकुशी की थी. लड़की शेल्टर होम के माहौल में खुद को ढाल नहीं पा रही थी. उसे जीने से ज्यादा मरना आसान लगा. यहीं की एक और लड़की हिंसक माहौल में रहकर अपना मानसिक संतुलन खो बैठी. बॉयज़ शेल्टर होम में कमोबेश ऐसी ही स्थिति है. मोतिहारी के एक शेल्टर होम में लड़कों कि पिटाई रोज़ की बात थी. जब TISS की टीम वहां पहुंची, तो कई लड़कों के शरीर पर चोट के निशान देखे गए. भागलपुर बॉयज़ शेल्टर होम में भी हिंसा और मारपीट की घटनाएं सामने आई. मुंगेर के बॉयज़ शेल्टर होम में रहने वाले बच्चों को सुपरीटेंडेंट का सारा काम करना होता था. अगर वो खाना बनाने, कपड़े धोने और झाड़ू-पोछें से इनकार करते, तो पिटाई होती. वहीं, गया के शेल्टर होम में फीमेल स्टाफ बच्चों से अश्लील मैसेज पढ़ने के लिए देती थी. पटना, मधुबनी, कैमुर के स्पेशलाइज्ड अडॉप्शन सेंटर का भी यही हाल है.
वापस लौटते हैं मुजफ्फरपुर शेल्टर होम केस पर. इस केस में ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने बयान देने वाली 10 साल की बच्ची ने बताया था कि कैसे रेप से पहले उसे नशीली दवाएं दी जाती थीं. इसके बाद उसे कुछ होश नहीं रहता था. बाद में तेज़ दर्द के साथ होश आता. प्राइवेट पार्ट में गहरी चोट भी होती. मजिस्ट्रेट के सामने एक और लड़की ने बताया था, 'जब कोई तोंदवाले 'अंकलजी' और 'नेताजी' के साथ लड़की होती थी, तो किसी को भी उस कमरे में जाने की इजाजत नहीं थी.' मामले में गिरफ्तार चाइल प्रोटेक्शन ऑफिसर की बीवी का कहना है कि शेल्टर होम में रहने वाली लड़कियां सामाजिक कल्याण विभाग की मंत्री मंजू वर्मा के पति को 'नेताजी' कहती थीं. वहीं, मंत्री मंजू वर्मा का कहना है कि उन्हें उनकी जाति की वजह से टारगेट किया जा रहा है. बिहार के शेल्टर होम कैसे हैवानों के लिए पनाहगार बनते जा रहे हैं? इसकी पूरी तह तक जाने के लिए 'NEWS18'ने TISS के डायरेक्टर तारीक का इंटरव्यू लिया. इन्हीं के वजह से मुज़फ्फरनगर शेल्टर होम का पूरा केस सामने आया है.
तारीक से हुई बातचीत के खास अंश:-
शेल्टर होम की ऑडिटिंग का आइडिया आपको कहां से आया?
>>सामाजिक कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव से मुलाकात के दौरान हुई छोटी सी बातचीत में मुझे ये ख्याल आया. हम बात कर रहे थे कि कैसे ये इंस्टिट्यूशन गलत चीजों को भी बड़ी सफाई से मैनेज कर जाते हैं. बातचीत में ये बात भी सामने आई कि इन शेल्टर होम में कई बच्चों और बच्चियों को जबरन कैद करके रखा जाता है.
हमने सोचा क्यों न शेल्टर होम की ऑडिटिंग हो, ताकि पूरा सच सामने आए. सर्वे से पहले किसी को भी यकीन नहीं था कि रिजल्ट ऐसा आएगा. हमने ये जानने के लिए सर्वे शुरू किया था कि इन शेल्टर होम में फंड का सही इस्तेमाल हो रहा है या नहीं. साथ ही उन लोगों की पहचान करना भी था, जिसकी वजह से इस तरह की संस्थानों में भ्रष्टाचार होता है. सर्वे के सब्जेक्ट के तौर पर हमने पहले सिर्फ उन संस्थानों को ही लिया था, जो एनजीओ से संचालित होती हैं. लेकिन, सामाजिक कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव ने सुझाव दिया कि हमें सरकारी संस्थानों का भी ऑडिट कराना चाहिए. सर्वे खत्म होने तक हमारे सामने ऐसी चीजें आईं, जो बेहद चौंकाने वाली थीं.
ऑडिटिंग के लिए आपने कितने शेल्टर होम को सब्जेक्ट के तौर पर लिया था?
>>हमने बिहार के 38 जिलों के कुल 110 शेल्टर होम को सब्जेक्ट के तौर पर चुना.
और सर्वे से क्या पता चला?
>>ज्यादातर संस्थानों में रहने वाले बच्चों-बच्चियों के साथ शारीरिक शोषण की बात सामने आई. इसलिए हमने इन मामलों को पुलिस में रेफर कर दिया. क्योंकि हम कोई इंवेस्टिगेटिव एजेंसी तो है नहीं. लेकिन, इन संस्थानों में कई बार जाने और वहां के लोगों से बात करने के बाद हम कम से कम ये तो बता सकते हैं कि इनमें से कहां मानवाधिकारों का हनन हो रहा है.
क्या इसमें मुजफ्फरनगर का शेल्टर होम भी शामिल है?
>>हां. हमें वहां का माहौल देखकर ही इस बात का अहसास हो गया था कि यहां जरूर यौन शोषण जैसा कुछ गंभीर अपराध हो रहा है. शेल्टर होम में जो हो रहा था, वो बहुत गंभीर था. हमारी कल्पना के बाहर. हर लड़की की अपनी अलग कहानी थी. शेल्टर होम में रहने वाली ज्यादातर लड़कियों के शरीर और प्राइवेट पार्ट में जख्म और जलने के निशान थे. इनकी मलहम-पट्टी भी नहीं की गई थी.
एक बच्ची ने बताया, 'अंकलजी ने मेरे निचले हिस्से (प्राइवेट पार्ट) में ब्लेड से कई निशान बना दिए थे और कहा था कि इससे मैं उन्हें हमेशा याद रखूंगी.' शेल्टर होम में रहने वाली ज्यादातर बच्चियों की उम्र 7 से 15 साल के बीच है. चाइल्ड वेलफेयर कमिटी तक इसमें शामिल है.
क्यों?
>>क्योंकि चाइल्ड वेलफेयर कमिटी पर इन बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी है. ये ही बच्चों के बारे में सारे फैसले ले सकते हैं. ऐसी संस्थानों में एक सिस्टम होता है, जिसमें बच्चों की पूरी जिम्मेदारी चाइल वेलफेयर कमिटी की होती है. इन बच्चों की किसी भी तरह के शोषण से रक्षा करना भी चाइल्ड वेलफेयर कमिटी का काम है. लेकिन, ज्यादातर शेल्टर होम में ये रक्षक ही भक्षक बने हुए हैं.
इस तरह की संस्थानों में जहां के सदस्य ही अपराध और यौन उत्पीड़न के दोषी हैं, आप समझ सकते हैं कि वहां रहने वाले बच्चों-बच्चियों की हालत कैसी होती होगी. शारीरिक और मानसिक शोषण से बच्चियां बहुत डरी हुई है. अपना आत्मविश्वास खो चुकी है. वो अब किसी पर भी भरोसा नहीं करतीं. हमेशा खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं. अदालत को इनके दोषियों के लिए कड़ी से कड़ी सजा देनी चाहिए, ताकि समाज में एक उदाहरण पेश हो.
इस सर्वे में आपको कैसी प्रतिक्रिया मिली?
>>सभी तरह की प्रतिक्रिया सामने आई. कुछ सकारात्मक थीं, तो ज्यादातर नकारात्मक. मामले में अब तो राजनीतिक बहसबाजी भी शुरू हो चुकी है. आरजेडी ऐसा कर रही है. जेडीयू ने फिलहाल ऐसा कुछ किया नहीं.
हम बच्चियों के कल्याण और उनको आगे बढाने की बात करते हैं. लेकिन, शेल्टर होम में बच्चियों ने जो ट्रॉमा झेला, क्या किसी को भी उसका ज़रा सा भी अंदाजा है? दोषियों को सज़ा मिलनी ही चाहिए. उन बच्चियों के लिए अगर हम कुछ करना ही चाहते हैं, तो कम से कम इतना करे कि मामले में राजनीति न हो. हमे एकजुट होकर इन बच्चियों की जिंदगी को संवारने में मदद करना चाहिए.
क्या ऐसा पहले नहीं हुआ?
>>इस मामले से इतना तो साफ हो चुका है कि बच्चे अब समाज के लिए सबसे कम महत्वपूर्ण हो गए हैं. संस्थानों में निरीक्षण के नाम पर ज्यादातर चीजें फाइलों और डॉक्यूमेंट में सिमट कर रह जाती हैं. व्यावहारिक तौर पर ज्यादा कुछ होता नहीं. संस्थानों के रजिस्टर क्या नियमित रूप से अपडेट किए जाते हैं? नहीं किए जाते.
हालांकि, डॉक्यूमेंटेशन कोई सिस्टम का बेंचमार्क नहीं है. बात बच्चों के पुनर्वास की है. अगर कोई बच्चा शेल्टर होम में सालों से रह रहा है, तो ये उसकी गलती नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम की नाकामी है.
तो हमें और किन चीजों पर काम करना चाहिए?
>>हमे ये सुनिश्चित करना होगा कि सिस्टम में सबकुछ सही करीके से काम कर रहा है. फंड का सही इस्तेमाल हो रहा है या नहीं, इसका भी आकंलन होना जरूरी है. चीजें पारदर्शी होनी चाहिए. शेल्टर होम चलाने के लिए कुछ गाइलाइंस होते हैं. इन्हें फॉलो किया जा रहा है कि नहीं, ये भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए. ताकि यहां रहने वाली बच्चियां गरिमा और सम्मान के साथ रह सके.
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