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अगर किसी की शव यात्रा बिल्व वृक्ष की छाया से होकर गुजरे तो उसका मोक्ष हो जाता है।
बलौदाबाजार । सावन और फिर भगवान शिव के पूजन की बात आए और बिल्व पत्र की चर्चा ना हो, यह नामुमकिन है। महीना सावन का ही है और जगह-जगह शिवजी के अभिषेक और वंदन की धूम है। पूजन में उन्हें बेल पत्र अर्पित करके प्रसन्ना किया जा रहा है। माना जाता है कि बिल्व पत्र भगवान शिव को बेहद प्रिय है। कहा भी गया है 'दर्शनम् बिल्व पत्रस्य, स्पर्शनमं पाप नाशनम्' अर्थात बेल पत्र का दर्शन कर लेने मात्र से पापों का शमन हो जाता है। बेल पत्र अगर दुर्लभ या विशेष प्रकार का हो तो फिर इसके क्या कहने..। वहीं ग्राम चांपा स्थित एक खेत में ऐसा ही दुर्लभ बेल पत्र मिला है।

अमूमन देखा जाता है कि बेल पत्र पर तीन पत्तियां होती हैं लेकिन यह बेलपत्र चार पत्तियों वाला है। जानकार बताते हैं कि इस तरह के बेल पत्र का मिलना और दर्शन बेहद शुभ होता है। इसको शिवजी को अर्पित करने से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
शिवजी को समर्पित किया बेल पत्र
चार पत्तियों वाला यह बेल पत्र मिलने के बाद ग्राम चांपा में ग्रामीणों की भीड़ लग गई। कई पुरोहित और जानकार भी पहुंच गए। पंडितों का कहना है कि यह चार पत्तियों वाले बेल पत्र दुर्लभ माना गया है। इस तरह के बेल पत्र में यदि राम का नाम लिखकर उसे शिवजी को अर्पित कर दिया जाए तो उसका अनंत फल प्राप्त होता है। इसी तरह इस बेल पत्र में राम का नाम लिखकर उसे उनके प्रिय भगवान शिवजी को अर्पित कर दिया।
बेल पत्र से जुड़ी कुछ खास बातें
- बिल्व वृक्ष के आसपास सांप नहीं आते।
- अगर किसी की शव यात्रा बिल्व वृक्ष की छाया से होकर गुजरे तो उसका मोक्ष हो जाता है।
- वायुमंडल में व्याप्त अशुद्घियों को सोखने की क्षमता सबसे ज्यादा बिल्व वृक्ष में होती है।
- चार, पांच, छह या सात पत्तों वाला बिल्व पत्र पाने वाला परम भाग्यशाली होता है। इसे शिव को अर्पण करने से अनंत गुना फल मिलता है।
- सुबह-शाम बेल वृक्ष के दर्शन मात्र से पापों का नाश होता है।
- बेल वृक्ष को सींचने से पितर तृप्त होते हैं।
::/fulltext::जगदलपुर । बस्तर जिला के मुख्यालय जगदलपुर से 46 और राजधानी रायपुर से 346 किमी दूर छग और ओड़िशा राज्य की सीमा पर गुप्तेश्वर नामक स्थान में पहाड़ी गुफा में पौराणिक गुप्तेशवर मंदिर है। इसके दर्शन व उपासना से मनौती पूर्ण होती हैं। लोक मान्यता है कि इस भूगर्भीय विशाल शिवलिंग की खोज भगवान राम ने की थी। इसके दर्शन व उपासना से मनौती पूर्ण होती हैं। महाशिवरात्रि पर लाखों श्रध्दालु सैकड़ों किमी दूर से यहां पहुंचते हैं। यहां कारी गाय गुफा के ऊपर से शिवलिंग पर बूंद-बूंद टपक रहा जल अगर भक्त की हथेली में टपक जाए तो उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। पौराणिक कथा है कि भगवान राम वनवास के दौरान बारिश का चार्तुमास यहीं व्यतीत किए थे। शबरी नदी के किनारे एक पहाड़ी पर गुफा में हजारों साल पुराना व प्राकृत करीब पांच फीट ऊॅंचा शिवलिंग है। हजारों भक्त इनकी एक झलक पाने शबरी नदी के खतरनाक चट्टानों से होकर पहुंचते हैं। यह सब वन विभाग द्वारा चट्टानों में बांस की चटाई बिछाने के बाद ही संभव हो पाता है। नदी का प्राकृतिक सौन्दर्य इस शिवधाम के प्रति लोगों को और आकृष्ट करता है।

आस्था का केंद्र
दण्डकारण्य में स्थित होने के कारण पूरे बस्तर सहित पड़ोसी राज्य ओड़िशा से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आते है। मंदिर समिति और ग्रामीणों द्वारा सावन की तैयारी की गई है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आकर भोलेनाथ का अभिषेक करते है। वहीं प्रति सोमवार यहां ज्यादा भीड़ रहती है।
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