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Monday, 13 April 2026

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प्रत्येक जातक को अपनी जन्म कुंडली में ग्रहों की शुभ-अशुभ स्थिति के अनुसार शिवलिंग का पूजन करना चाहिए।...

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शिव पुराण में श्रावण के शुभ समय के लिए कुछ अचूक उपाय बताए गए हैं। प्रत्येक जातक को अपनी जन्म कुंडली में ग्रहों की शुभ-अशुभ स्थिति के अनुसार शिवलिंग का पूजन करना चाहिए। ग्रहों से संबंधित कष्टों और रोगों के लिए निम्न उपाय अपनाएं।
 
जानिए ग्रह के अनुसार किस रोग के लिए क्या उपाय कर सकते हैं।
 
सूर्य से संबंधित कष्ट सिरदर्द, नेत्र रोग, अस्थि रोग आदि हों तो में शिवलिंग का पूजन आक वृक्ष के पुष्पों, पत्तों एवं बिल्वपत्रों से करने से इन रोगों में आराम मिलता है।
 
चंद्रमा से संबंधित बीमारी या कष्ट जैसे खांसी, जुकाम, नजला, मानसिक परेशानी, रक्तचाप की समस्या आदि हों तो शिवलिंग का रुद्री पाठ करते हुए काले तिल मिश्रित दूध धार से रुद्राभिषेक करने से आराम मिलता है।
 
मंगल से संबंधित बीमारी जैसे रक्तदोष हो तो गिलोय, जड़ी-बूटी के रस आदि से अभिषेक करने से आराम मिलता है।
 
बुध से संबंधित बीमारी जैसे चर्म रोग, गुर्दे का रोग आदि हों तो विदारा या जड़ी-बूटी के रस से अभिषेक करने से आराम मिलता है।
 
बृहस्पति से संबंधित बीमारी जैसे चर्बी, आंतों की बीमारी या लिवर की बीमारी आदि हों तो शिवलिंग पर हल्दी मिश्रित दूध चढ़ाने से आराम मिलता है।
 
शुक्र से संबंधित बीमारी, वीर्य की कमी, गुप्तांग की बीमारी, शारीरिक या शक्ति में कमी हो तो पंचामृत, शहद और घी से शिवलिंग का अभिषेक करने से आराम मिलता है।
 
शनि से संबंधित रोग जैसे मांसपेशियों का दर्द, जोड़ों का दर्द, वात रोग आदि हों तो गन्ने के रस और छाछ से शिवलिंग का अभिषेक करने से आराम मिलता है।
 
राहु-केतु से संबंधित बीमारी जैसे सिर चकराना, मानसिक परेशानी आदि के लिए उपर्युक्त सभी वस्तुओं के अतिरिक्त मृत संजीवनी का सवा लाख बार जप कराकर भांग-धतूरे से शिवलिंग का अभिषेक करने से शांति मिलती है।
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श्रावण महीने को देवों के देव महादेव भगवान शंकर का महीना माना जाता है।....

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पौराणिक मान्यता के अनुसार श्रावण महीने को देवों के देव महादेव भगवान शंकर का महीना माना जाता है। इस संबंध में पौराणिक कथा है कि जब सनत कुमारों ने महादेव से उन्हें श्रावण महीना प्रिय होने का कारण पूछा तो महादेव भगवान शिव ने बताया कि जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति से शरीर त्याग किया था, उससे पहले देवी सती ने महादेव को हर जन्म में पति के रूप में पाने का प्रण किया था। अपने दूसरे जन्म में देवी सती ने पार्वती के नाम से हिमाचल और रानी मैना के घर में पुत्री के रूप में जन्म लिया। पार्वती ने युवावस्था के श्रावण महीने में निराहार रह कर कठोर व्रत किया और उन्हें प्रसन्न कर विवाह किया, जिसके बाद ही महादेव के लिए यह विशेष हो गया। 
 
श्रावण में शिवशंकर की पूजा :- श्रावण के महीने में भगवान शंकर की विशेष रूप से पूजा की जाती है। इस दौरान पूजन की शुरुआत महादेव के अभिषेक के साथ की जाती है। अभिषेक में महादेव को जल, दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, गंगाजल, गन्ना रस आदि से स्नान कराया जाता है। अभिषेक के बाद बेलपत्र, समीपत्र, दूब, कुशा, कमल, नीलकमल, ऑक मदार, जंवाफूल कनेर, राई फूल आदि से शिवजी को प्रसन्न किया जाता है। इसके साथ की भोग के रूप में धतूरा, भाँग और श्रीफल महादेव को चढ़ाया जाता है।
 
महादेव का अभिषेक :- महादेव का अभिषेक करने के पीछे एक पौराणिक कथा का उल्लेख है कि समुद्र मंथन के समय हलाहल विष निकलने के बाद जब महादेव इस विष का पान करते हैं तो वह मूर्च्छित हो जाते हैं। उनकी दशा देखकर सभी देवी-देवता भयभीत हो जाते हैं और उन्हें होश में लाने के लिए निकट में जो चीजें उपलब्ध होती हैं, उनसे महादेव को स्नान कराने लगते हैं। इसके बाद से ही जल से लेकर तमाम उन चीजों से महादेव का अभिषेक किया जाता है।
 
 बेलपत्र और समीपत्र :- भगवान शिव को भक्त प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र और समीपत्र चढ़ाते हैं। इस संबंध में एक पौराणिक कथा के अनुसार जब 89 हजार ऋषियों ने महादेव को प्रसन्न करने की विधि परम पिता ब्रह्मा से पूछी- तो ब्रह्मदेव ने बताया कि महादेव सौ कमल चढ़ाने से जितने प्रसन्न होते हैं, उतना ही एक नीलकमल चढ़ाने पर होते हैं। ऐसे ही एक हजार नीलकमल के बराबर एक बेलपत्र और एक हजार बेलपत्र चढ़ाने के फल के बराबर एक समीपत्र का महत्व होता है।

बेलपत्र ने दिलाया वरदान : बेलपत्र महादेव को प्रसन्न करने का सुलभ माध्यम है। बेलपत्र के महत्व में एक पौराणिक कथा के अनुसार एक भील डाकू परिवार का पालन-पोषण करने के लिए लोगों को लूटा करता था। श्रावण महीने में एक दिन डाकू जंगल में राहगीरों को लूटने के इरादे से गया। एक पूरा दिन-रात बीत जाने के बाद भी कोई शिकार नहीं मिलने से डाकू काफी परेशान हो गया।
 
इस दौरान डाकू जिस पेड़ पर छुपकर बैठा था, वह बेल का पेड़ था और परेशान डाकू पेड़ से पत्तों को तोड़कर नीचे फेंक रहा था। डाकू के सामने अचानक महादेव प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा। अचानक हुई शिव कृपा जानने पर डाकू को पता चला कि जहां वह बेलपत्र फेंक रहा था उसके नीचे शिवलिंग स्थापित है। इसके बाद से बेलपत्र का महत्व और बढ़ गया।
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162 सालों बाद 27 जुलाई को चंद्रग्रहण पर बन रहा है ये दुर्लभ केमद्रुम योग....


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13 जुलाई शुक्रवार को इस साल के दूसरे सूर्य ग्रहण के बाद अब इसी महीने में एक और ग्रहण जल्द ही लगने वाला है। जी हां, इस बार यह सूर्य नहीं बल्कि चंद्र ग्रहण होगा जो 27 जुलाई, शुक्रवार को लगने वाला है।

चंद्र ग्रहण

सूर्य और चंद्रमा के बीच पृथ्वी के आ जाने के कारण सूर्य की पूरी रोशनी चंद्रमा पर नहीं पड़ती है तब इसे चंद्र ग्रहण कहते हैं। सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा का एक सरल रेखा में होना चंद्र ग्रहण की स्थिति बनाता है। चंद्र ग्रहण भी आंशिक और पूर्ण दोनों रूप में होते हैं। ये इस साल का नहीं बल्कि पूरे 21 वीं सदी का सबसे बड़ा और पूर्ण चंद्र ग्रहण होगा। अगर जानकारों की मानें तो यह विशेष संयोग करीब 104 साल बाद बन रहा है। इस बार यह ब्लड मून होगा।

162 साल बाद केमद्रुम योग

इस बार इस ग्रहण के साथ केमद्रुम योग बन रहा है। जानकारों के अनुसार यह योग 162 सालों में एक बार बनता है। कुंडली में बने केमद्रुम दोष की शांति के लिए यह योग बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। चन्द्र ग्रहण काल में केमद्रुम दोष से पीड़ित जातक इस दोष का निवारण कर इससे मुक्ति पा सकते हैं। चलिए जानते हैं क्या है केमद्रुम योग।

क्या है केमद्रुम योग और क्यों बनता है

ये जब जातक की कुंडली में चंद्रमा के आगे-पीछे कोई ग्रहण नहीं होता है तब केमद्रुम योग बनता है। इस दोष के कारण जातक के जीवन में कई तरह की परेशानियां आती हैं जैसे, रोग, दरिद्रता, पारिवारिक कलह आदि। इतना ही नहीं व्यक्ति हमेशा खुद को अकेला ही पाता है। इस दशा में व्यक्ति के भीख मांग कर खाने की भी स्थिति आ जाती है। इस दोष की वजह से व्यक्ति के जीवन में कई सारी बाधाएं उत्पन्न होती है लेकिन दूसरी ओर उसे इन मुश्किलों का सामना करने की ताकत भी मिलती है। चन्द्रमा के आगे और पीछे का स्थान खाली रहना हमारे दिमाग के भाग का प्रतीक होता है। जैसा कि हम सब जानते हैं कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है ठीक उसी प्रकार इस दोष से पीड़ित जातक का जीवन उसके बुरे ख्यालों की वजह से नकारात्मक ऊर्जा से घिरा रहता है।

केमद्रुम दोष से मुक्ति के उपाय

जैसा कि हमने आपको बताया कि इस दोष के कारण मनुष्य का जीवन परेशानियों से भर जाता है। न तो व्यक्ति के जीवन में खुशियां आती है, न उसे सच्चे प्रेम की प्राप्ति होती है और न ही उसे कोई और सुख मिलता है। ऐसे में जितनी जल्दी हो सके इस दोष का निवारण कर लेना चाहिए ताकि जातक को इस तरह की समस्याओं से छुटकारा मिल सके।

केमद्रुम योग के अशुभ प्रभाव से बचने के कुछ उपाय

1. सोमवार की पूर्णिमा के दिन या सोमवार को चित्रा नक्षत्र से लगातार चार वर्ष तक पूर्णिमा का व्रत रखें। 2. इस दोष से पीड़ित जातकों के लिए शिव और लक्ष्मी जी की उपासना बेहद फायदेमंद होती है। 3. प्रत्येक सोमवार को शिवलिंग पर गाय का कच्चा दूध चढ़ाएं साथ ही शिव पंचाक्षरी मंत्र ॐ नमः शिवाय का जाप करें। इस मंत्र के जाप के लिए आप रुद्राक्ष की माला का प्रयोग कर सकते हैं। 4. महामृत्युंजय मंत्र का जाप प्रतिदिन 108 बार करें। 5. घर में दक्षिणावर्ती शंख स्थापित करें। इस शंख के जल से लक्ष्मी जी को स्नान करवाएं। किसी भी ग्रह दोष से मुक्ति पाने के लिए हम पूजा पाठ का सहारा लेते हैं ताकि हमें ईश्वर की कृपा और आशीर्वाद दोनों ही प्राप्त हो जाए और हमारा जीवन सुखमय बन जाए।

इस चंद्र ग्रहण पर केमद्रुम पूजा

केमद्रुम दोष से पीड़ित व्यक्ति इस शुभ योग में अपने इस दोष का निवारण कर सकता है। आषाढ़ पूर्णिमा होने के कारण यह अवसर और भी शुभ हो गया है।162 सालों बाद यह चंद्र ग्रहण इस पूजा के लिए बहुत ही अच्छा माना जा रहा है। केमद्रुम योग पूजा करने से आपके सभी कष्ट दूर हो जाएंगे।


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