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Monday, 13 April 2026

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को भी कहते हैं। विश्‍वकर्मा देवताओं के तो मय दानव असुरों के वास्तुकार थे।.....

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को भी कहते हैं। विश्‍वकर्मा देवताओं के तो मय दानव असुरों के वास्तुकार थे। मय दानव हर तरह की रचना करना जानता था। मय विषयों का परम गुरु है। राजा बलि रसातल तो मय दानव तलातल का राजा था। सुतल लोक से नीचे तलातल है। वहां त्रिपुराधिपति दानवराज मय रहता है। पुराणों अनुसार पाताल लोक के निवासियों की उम्र हजारों वर्ष की होती है। के उत्तरकांड के अनुसार माया दानव, कश्यप ऋषि और उनकी पत्नी दिति का पुत्र और सम्राट की पत्नी मंदोदरी का पिता था। इसकी दो पत्नियां- हेमा और रंभा थीं जिनसे पांच पुत्र तथा तीन कन्याएं हुईं। रावण की पत्नी मंदोदरी की मां हेमा एक अप्सरा थी और उसके पिता एक असुर। अप्सरा की पुत्री होने की वजह से मंदोदरी बेहद खूबसूरत थी, साथ ही वह आधी दानव भी थी।
 
मय दावन की शक्ति : मयासुर एक खगोलविद भी था। कहते हैं कि 'सूर्य सिद्धांतम' की रचना मयासुर ने ही की थी। खगोलीय ज्योतिष से जुड़ी भविष्यवाणी करने के लिए ये सिद्धांत बहुत सहायक सिद्ध होता है। मय दानव के पास एक विमान रथ था जिसका परिवृत्त 12 क्यूबिट था और उस में चार पहिए लगे थे। इस विमान का उपयोग उसने देव-दानवों के युद्ध में किया था। देव- दानवों के इस युद्ध का वर्णन स्वरूप इतना विशाल है, जैसे कि हम आधुनिक अस्त्र-शस्त्रों से लैस सैनाओं के मध्य परिकल्पना कर सकते हैं।

मयासुर के निर्माण कार्य : ऐसा माना जाता है कि वह इतना प्रभावी और चमत्कारी वास्तुकार था कि अपने निर्माण के लिए वह पत्थर तक को पिघला सकता था। मयासुर ने दैत्यराज वृषपर्वन् के यज्ञ के अवसर पर बिंदुसरोवर के निकट एक विलक्षण सभागृह का निर्माण कर प्रसिद्धि हासिल की थी। रामायण के उत्तरकांड के अनुसार रावण की खूबसूरत नगरी, लंका का निर्माण विश्वकर्मा ने किया था लेकिन यह भी मान्यता है कि लंका की रचना स्वयं रावण के श्वसुर और बेहतरीन वास्तुकार मयासुर ने ही की थी।मैसूर,मंदसौर और मेरठ उसी के मान मे अपभ्रंष है। माया दानव ने सोने, चांदी और लोहे के तीन शहर जिसे त्रिपुरा कहा जाता है, का निर्माण किया था। त्रिपुरा को बाद में स्वयं भगवान शिव ने ध्वस्त कर दिया था। तारकासुर के लिए माया दानव ने इस तीनों राज्यों, त्रिपुरा का निर्माण किया था। तारकासुर ने ये तीनों राज्य अपने तीनों बेटों तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युनमाली को सौंप दिए थे।
 
माया सभ्यता का जनक : मायासुर को दक्षिण अमेरिका की प्राचीन माया सभ्यता का जनक भी माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि जो जानकारियां और विलक्षण प्रतिभा माया दानव के पास थी, वही माया सभ्यता के लोगों के पास भी थी। कहते हैं कि अमेरिका के प्रचीन खंडहर उसी के द्वारा निर्मित हैं। अमेरिका में शिव, गणेश, नरसिंह आदि देवताओं की मूर्तियां तथा शिलालेख आदि का पाया जाने इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि प्रचीनकाल में अमेरिका में भारतीय लोगों का निवास था। इसके बारे में विस्तार से वर्णन आपको भिक्षु चमनलाल द्वारा लिखित पुस्तक 'हिन्दू अमेरिका' में चित्रों सहित मिलेगा।

इंद्रप्रस्थ का निर्माता : में उल्लेख है कि मय दानव ने पांडवों के लिए इंद्रप्रस्थ नामक नगर की रचना की थी। यह भी कहा जाता है कि उसने द्वारिका के निर्माण में भी विश्‍वकर्मा का सहयोग किया था। खांडव वन के दहन के समय अर्जुन ने मय दानव को अभयदान दे दिया था। इससे कृतज्ञ होकर मय दानव ने अर्जुन से कहा, 'हे कुन्तीनंदन! आपने मेरे प्राणों की रक्षा की है अतः आप आज्ञा दें, मैं आपकी क्या सेवा करूं?'
 
अर्जुन ने उत्तर दिया, 'मैं किसी बदले की भावना से उपकार नहीं करता, किंतु यदि तुम्हारे अंदर सेवा भावना है तो तुम श्रीकृष्ण की सेवा करो।' मयासुर के द्वारा किसी प्रकार की सेवा की आज्ञा मांगने पर श्रीकृष्ण ने उससे कहा, 'हे दैत्यश्रेष्ठ! तुम युधिष्ठिर की सभा हेतु ऐसे भवन का निर्माण करो जैसा कि इस पृथ्वी पर अभी तक न निर्मित हुआ हो।' मयासुर ने कृष्ण की आज्ञा का पालन करके एक अद्वितीय नगर और उस नगर में एक भवन का निर्माण कर दिया। इसके साथ ही उसने पाण्डवों को देवदत्त शंख, एक वज्र से भी कठोर रत्नजटित गदा तथा मणिमय पात्र भी भेंट किया। यह भी कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश का मेरठ शहर भी मय दानव ने बनाया और बसाया था। सवाल यह है कि रामायण काल के मय दानव का महाभारत काल में होना कैसे संभव है।
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 महत्वपूर्ण है अमावस्या, इन जातकों को अवश्य करना चाहिए अमावस्या का उपवास...

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हिन्दू धर्म में बेहद महत्वपूर्ण है अमावस्या, इन जातकों को अवश्य करना चाहिए अमावस्या का उपवास...
 
1 . प्राचीन शास्त्रों के अनुसार अमावस्या तिथि के स्वामी पितृदेव हैं, अत: पितरों की तृप्ति के लिए इस तिथि का अत्यधिक महत्व है।
 
2. हिन्दू धर्म में अमावस्या तिथि का अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान है।
 
3. अमावस्या का दिन पितरों की स्मृति करने और श्रद्धा भाव से उनका श्राद्ध करने के लिए अत्यंत शुभ होता है।
 
4. इस दिन बहुत से जातक अपने पितरों की शांति के लिए हवन, ब्रह्मभोज आदि कराते हैं और साथ ही दान-दक्षिणा भी देते हैं। 
 
आइए जानते हैं कि अमावस्या के दिन किस प्रकार से पितरों को प्रसन्न करना चाहिए।
 
5. जिन व्यक्तियों की कुण्डली में पितृ दोष हो, संतानहीन योग बन रहा हो या फिर नवम भाव में राहु नीच के होकर स्थित हो, उन व्यक्तियों को अमावस्या पर उपवास अवश्य रखना चाहिए।
 
6. अमावस्या उपवास को करने से मनोवांछित उद्देश्य़ की प्राप्ति होती है।
 
7 . विष्णु पुराण के अनुसार श्रद्धा भाव से रखने से पितृगण ही तृप्त नहीं होते, अपितु ब्रह्मा, इंद्र, रुद्र, अश्विनी कुमार, सूर्य, अग्नि, अष्टवसु, वायु, विश्वदेव, ऋषि, मनुष्य, पशु-पक्षी और सरीसृप आदि समस्त भूत प्राणी भी तृप्त होकर प्रसन्न होते हैं।
 
8. शास्त्रों के अनुसार ऐसा माना गया है कि देवों से पहले पितरों को प्रसन्न करना चाहिए, तभी किसी भी पूजन का वांछित फल प्राप्त होता है।
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कर्ण को बहुत बड़ा दानी भी कहा जाता था। कहते हैं अगर कोई उससे कुछ माँग ले तो वह कभी इंकार नहीं करता था.....



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कर्ण महाभारत के वीर और बहादुर योद्धाओं में से एक था। हालांकि उसने यह युद्ध कौरवों की ओर से लड़ा था फिर भी वह श्री कृष्ण को बहुत प्रिय था क्योंकि उसका ह्रदय पवित्र और साफ़ था। साथ ही वह अच्छे गुणों वाला मनुष्य था। वह एक सच्चा इंसान होने के साथ साथ निडर योद्धा भी था। तीरंदाज़ी में महारथ हासिल करने वाले कर्ण ने बचपन से ही बहुत सारे कष्ट झेले थे। कर्ण दुर्योधन का सबसे अच्छा मित्र था इसलिए महाभारत में उसने युद्ध पांडवों के विरुद्ध लड़ा था। कर्ण को बहुत बड़ा दानी भी कहा जाता था। कहते हैं अगर कोई उससे कुछ माँग ले तो वह कभी इंकार नहीं करता था चाहे इसके लिए उसे अपने प्राण तक संकट में क्यों न डालने पड़ जाए। आइए जानते हैं कर्ण के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातें और साथ ही उन तीन वचनों के बारे में जो श्री कृष्ण ने कर्ण के अंतिम समय में उसे दिया था।

पिता से मिला था कवच

कर्ण की माता कुंती थी जो पांडवों की भी माता थी। कर्ण का जन्म कुंती और पांडु के विवाह के पूर्व हुआ था। सूर्य देव के आशीर्वाद से ही कुंती ने कर्ण को जन्म दिया था इसलिये कर्ण को सूर्य पुत्र कर्ण के नाम से जाना जाता है। सूर्यदेव ने अपने इस पुत्र को एक कवच प्रदान किया था जिससे उसे कोई भी पराजित नहीं कर पाता। कर्ण आज भी एक ऐसे महान योद्धा के रूप में जाना जाता है जो अपने समस्त जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ता रहा। वास्तव में उसे वह सब कुछ प्राप्त नहीं हो पाया जिसका वह असली हक़दार था।

जब सूर्यदेव ने कर्ण को दी चेतावनी

कहते हैं कर्ण प्रतिदिन सूर्यदेव को जल अर्पित करता था वह किसी के लिए भी अपना यह नियम कभी नहीं तोड़ता और उस समय उससे कोई भी कुछ भी माँग ले वह कभी इंकार नहीं करता। क्‍यों, कर्ण और अर्जुन दोनों ही बड़े बलवान और वीर पुरुष थे चूंकि कर्ण के पास उसके पिता का दिया हुआ कवच था इसलिए वह अर्जुन से अधिक शक्तिशाली माना जाता था। वहीं दूसरी ओर इंद्र देव इस बात से बड़े ही चिंतित और भयभीत थे कि कर्ण के पास वह कवच है इसलिए उन्होंने निर्णय लिया कि जब कर्ण सूर्यदेव को जल अर्पित कर रहा होगा तब वे दान स्वरुप वह कवच उससे मांग लेंगे। जब सूर्यदेव को वरुण देव के इरादों की भनक लगी तो उन्होंने फ़ौरन कर्ण को चेतावनी दी और उसे जल अर्पण करने से भी मना किया। किन्तु कर्ण ने उनकी एक न सुनी, उसने सूर्यदेव से कहा कि सिर्फ दान के भय से वह अपने पिता की उपासना करना नहीं छोड़ सकता।

इंद्र देव ने ब्राह्मण का रूप धारण किया

सूर्यदेव के मना करने के बावजूद अगली सुबह कर्ण उन्हें जल अर्पित करने नदी के तट पर पहुंच गया जहां पहले से ही इंद्र देव एक ब्राह्मण का रूप धारण करके उसका इंतज़ार कर रहे थे। जैसे ही वह सूर्यदेव की पूजा समाप्त करके उठा इंद्र देव उसके पास पहुंच गए और दान में उससे उसका कवच मांग लिया। अपने स्वभाव अनुसार उसने ख़ुशी ख़ुशी वह कवच उन्हें दान में दिया। हालांकि उसकी इस बात से प्रसन्न होकर उन्होंने कर्ण को एक अस्त्र प्रदान किया जिसका प्रयोग वह अपनी रक्षा हेतु केवल एक ही बार कर सकता था।

अर्जुन के साथ युद्ध में हुई कर्ण की हार

कहा जाता है इंद्र देव को दान में अपना कवच देना ही युद्ध में अर्जुन के हाथों कर्ण की हार का सबसे बड़ा कारण था। इसके अलावा कर्ण ने इंद्र देव के द्वारा दिए हुए उस अस्त्र का प्रयोग भी अर्जुन से युद्ध के पहले ही कर लिया था। हालांकि, उसके अच्छे कर्म और सत्य के प्रति उसके समर्पण के कारण ही वह श्री कृष्ण के बेहद करीब था।

श्री कृष्ण ने दिए थे कर्ण को ये तीन वचन

कहते हैं कर्ण की हार से श्री कृष्ण बहुत दुखी हुए थे। उसके अंतिम क्षणों में वे उसके समक्ष प्रकट हुए और उससे उसकी अंतिम इच्छा पूछी। तब कर्ण ने उनसे तीन वचन मांगे जो इस प्रकार हैं।

अपने पहले वचन में कर्ण ने श्री कृष्ण से जात पात का भेदभाव खत्म करने के लिए कहा ताकि सबको एक बराबर का दर्जा दिया जाए। कर्ण इस बात से हमेशा दुखी रहता था कि उसकी माता ने उसे विवाह के पहले सूर्यदेव के आशीर्वाद से जन्म दिया था। उसके चरित्र पर कोई उंगली न उठे इसलिए उसकी माता ने उसे समाज के सामने कभी स्वीकार नहीं किया। इस वजह से कर्ण को सूत पुत्र यानी नीची जाती का माना जाने लगा। कर्ण के साथ अकसर भेदभाव किया जाता और उसका अपमान भी होता। गुरु द्रोणाचार्य ने भी इसी कारण कर्ण को अपना शिष्य बनाने से साफ़ इंकार कर दिया था। इस वजह से कर्ण चाहता था कि जैसे उसके साथ हुआ वैसा और किसी के साथ न हो।

अपने दूसरे वचन में कर्ण ने श्री कृष्ण से कहा कि जब भी वे अपना अगला अवतार लेकर धरती पर आये तो वे उसके राज्य में ही जन्म लें।

अपने अंतिम और तीसरे वचन में कर्ण ने श्री कृष्ण से कहा कि उसका दाह संस्कार ऐसे स्थान पर किया जाए जो पवित्र हो और सभी पापों से मुक्त हो। जहां कभी कुछ गलत न हुआ हो। चूंकि महाभारत के युद्ध के बाद ऐसा कोई स्थान नहीं था इसलिए श्री कृष्ण ने निर्णय लिया कि वे अपने हाथों की हथेली पर उसका अंतिम संस्कार करेंगे।

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गाय की पूजा करने से नौ ग्रह शांत रहते हैं। गौ माता के पंचगव्य के बिना पूजा पाठ हवन सफल नहीं होते।.....

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 हिन्दू धर्म में मान्यता है गाय में सभी 33 कोटि देवी-देवताओं का वास है। इसीलिए गाय की सेवा करने के लिए कहा जाता है, ताकि हर तरह की परेशानी को वह हर लें। अब तो विज्ञान भी इस बात को स्वीकार करने लगा है कि गाय की पीठ पर हाथ फिराने से व्यक्ति का ब्लड प्रेशर नियंत्रित्र रहता है।

आइए जानते हैं ज्योतिष में गाय से जुड़े टोटकों के बारे में...

1. यदि किसी व्यक्ति को नजर लग गई हो, तो उसे गाय की पूंछ से झाड़ लेने से बुरी नजर उतर जाती है।

2. जिस व्यक्ति का भाग्य साथ नहीं देता हो, वह अपने हाथ में गुड़ रखकर गाय को खिलाए। गाय की जीभ से हथेली चाटने पर भाग्य जाग जाता है।

3. गाय की पूजा करने से नौ ग्रह शांत रहते हैं। गौ माता के पंचगव्य के बिना पूजा पाठ हवन सफल नहीं होते।

4. पहली रोटी गौ माता के लिए पकाएं व खिलाएं। प्रत्येक मांगलिक कार्यों में गौ माता को अवश्य शामिल करें।

5. काली गाय का पूजन करने से नौ ग्रह शांत रहते हैं। जिस जगह पर गाय रहती है, वहां सांप और बिच्छू नहीं आते हैं।

 यदि आप किसी महत्वपूर्ण यात्रा पर जा रहे हैं और चाहते हैं कि सफल होकर ही लौटें तो जाने से पहले गाय को भोजन कराकर जाएं। यदि यात्रा पर निकलते समय अचानक रास्ते में कोई गाय सामने पड़ जाए अथवा बछड़े को दूध पिलाती हुई सामने दिख जाए तो भी यात्रा सफल हो जाती है।  

‘निर्णयामृत’ एवं ‘कूर्मपुराण’ में गायों की पूजा के लिए गोप अष्टमी का उल्लेख किया गया है। कार्तिक शुक्ल अष्टमी को प्रातः काल के समय गायों के स्नान कराएं, गंध पुष्पादि से पूजन करें तथा अनेक प्रकार के वस्त्रालंकार से अंलकृत करके उनके ग्वालों का पूजन करें। इसके बाद गायों को गौ ग्रास देकर उनकी परिक्रमा करें और थोड़ी दूर तक उनके साथ जाएं। मान्यता है कि ऐसा करने से सब प्रकार की अभीष्ट सिद्धि होती है।

गोपाष्टमी को शाम के समय जब गाय वापस लौटें, तो उस समय भी उनका आतिथ्य अभिवादन करें, कुछ भोजन कराएं और उनकी चरणरज को मस्तक पर लगाने से जीवन में सौभाग्य की वृद्धि होती है।

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