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Monday, 13 April 2026

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रामायण काल में थीं ये विचित्र किस्म की प्रजातियां, वैज्ञानिक रहस्य जानकर चौंक जाएंगे.....

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भगवान राम का काल ऐसा काल था जबकि धरती पर विचित्र किस्म के लोग और प्रजातियां रहती थीं, लेकिन प्राकृतिक आपदा या अन्य कारणों से ये प्रजातियां अब लुप्त हो गई। जैसे, वानर, गरूड़, आदि। माना जाता है कि में सभी पशु, पक्षी और मानव की काया विशालकाय होती थी। मनुष्य की ऊंचाई 21 फिट के लगभग थी।

जाति : वानर को बंदरों की श्रेणी में नहीं रखा जाता था। 'वानर' का अर्थ होता था- वन में रहने वाला नर। ऐसे मानव जिनकी पूंछ होती थी और जिनके मुंह बंदरों जैसे होते थे। वे मानव भी सामान्य मानवों के साथ घुल-मिलकर ही रहते थे। उन प्रजातियों में 'कपि' नामक जाति सबसे प्रमुख थी। जीवविज्ञान शास्त्रियों के अनुसार 'कपि' मानवनुमा एक ऐसी मुख्‍य जाति है जिसके अंतर्गत छोटे आकार के गिबन, सियामंग आदि आते हैं और बड़े आकार में चिम्पांजी, गोरिल्ला और ओरंगउटान आदि वानर आते हैं। इस कपि को साइंस में होमिनोइडेया (hominoidea) कहा जाता है।

हनुमानजी वानरों की कपि जाति से थे। भारत के दंडकारण्य क्षेत्र में वानरों और असुरों का राज था। हालांकि दक्षिण में मलय पर्वत और ऋष्यमूक पर्वत के आसपास भी वानरों का राज था। इसके अलावा जावा, सुमात्रा, इंडोनेशिया, मलेशिया, माली, थाईलैंड जैसे द्वीपों के कुछ हिस्सों पर भी वानर जाति का राज था। ऋष्यमूक पर्वत वाल्मीकि रामायण में वर्णित वानरों की राजधानी किष्किंधा के निकट स्थित था। किष्किंधा नगर कर्नाटक के हम्पी, जिला बेल्लारी में स्थित है।

गरूड़ : माना जाता है कि गिद्धों (गरूड़) की एक ऐसी प्रजाति थी, जो बुद्धिमान मानी जाती थी और उसका काम संदेश को इधर से उधर ले जाना होता था, जैसे कि प्राचीनकाल से कबूतर भी यह कार्य करते आए हैं। भगवान विष्णु का वाहन है गरूड़। राम के काल में सम्पाती और जटायु नाम के दो गरूड़ थे। ये दोनों भी दंडकारण्य क्षेत्र में रहते थे, खासकर मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में इनकी जाति के पक्षियों की संख्या अधिक थी। छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य में गिद्धराज जटायु का मंदिर है। प्रजापति कश्यप की पत्नी विनता के दो पुत्र हुए- गरूड़ और अरुण। गरूड़जी विष्णु की शरण में चले गए और अरुणजी सूर्य के सारथी हुए। सम्पाती और जटायु इन्हीं अरुण के पुत्र थे। पुराणों के अनुसार सम्पाती और जटायु दो गिद्ध-बंधु थे। सम्पाती बड़ा था और जटायु छोटा। ये दोनों विंध्याचल पर्वत की तलहटी में रहने वाले निशाकर ऋषि की सेवा करते थे।
 
रीझ : रामायण काल में रीझनुमा मानव भी होते थे। जाम्बवंतजी इसका उदाहण हैं। भालू या रीछ उरसीडे (Ursidae) परिवार का एक स्तनधारी जानवर है। हालांकि इसकी अब सिर्फ 8 जातियां ही शेष बची हैं। संस्कृत में भालू को 'ऋक्ष' कहते हैं। निश्चित ही अब जाम्बवंत की जाति लुप्त हो गई है। हालांकि यह शोध का विषय है। जाम्बवंत को आज रीछ की संज्ञा दी जाती है, लेकिन वे एक राजा होने के साथ-साथ इंजीनियर भी थे। समुद्र के तटों पर वे एक मचान को निर्मित करने की तकनीक जानते थे, जहां यंत्र लगाकर समुद्री मार्गों और पदार्थों का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता था। मान्यता है कि उन्होंने एक ऐसे यंत्र का निर्माण किया था, जो सभी तरह के विषैले परमाणुओं को निगल जाता था। माना जाता है कि वर्तमान के रीछ या भालू इन्हीं के वंशज हैं। जाम्बवंत की उम्र बहुत लंबी थी। 5 हजार वर्ष बाद उन्होंने श्रीकृष्ण के साथ एक गुफा में स्मयंतक मणि के लिए युद्ध किया था। जाम्बवंत की बेटी के साथ कृष्ण ने विवाह किया था। भारत में जम्मू-कश्मीर में जाम्बवंत गुफा मंदिर है।
 
काकभुशुण्डि : लोमश ऋषि के शाप के चलते काकभुशुण्डि कौवा बन गए थे। लोमश ऋषि ने शाप से मु‍क्त होने के लिए उन्हें राम मंत्र और इच्छामृत्यु का वरदान दिया। कौवे के रूप में ही उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत किया। वाल्मीकि से पहले ही काकभुशुण्डि ने रामायण गिद्धराज गरूड़ को सुना दी थी। इससे पूर्व हनुमानजी ने संपूर्ण रामायण पाठ लिखकर समुद्र में फेंक दी थी। वाल्मीकि श्रीराम के समकालीन थे और उन्होंने रामायण तब लिखी, जब रावण-वध के बाद राम का राज्याभिषेक हो चुका था।
 
जब रावण के पुत्र मेघनाथ ने श्रीराम से युद्ध करते हुए श्रीराम को नागपाश से बांध दिया था, तब देवर्षि नारद के कहने पर गिद्धराज गरूड़ ने नागपाश के समस्त नागों को खाकर श्रीराम को नागपाश के बंधन से मुक्त कर दिया था। भगवान राम के इस तरह नागपाश में बंध जाने पर श्रीराम के भगवान होने पर गरूड़ को संदेह हो गया। गरूड़ का संदेह दूर करने के लिए देवर्षि नारद उन्हें ब्रह्माजी के पास भेज देते हैं। ब्रह्माजी उनको शंकरजी के पास भेज देते हैं। भगवान शंकर ने भी गरूड़ को उनका संदेह मिटाने के लिए काकभुशुण्डिजी के पास भेज दिया। अंत में काकभुशुण्डिजी ने राम के चरित्र की पवित्र कथा सुनाकर गरूड़ के संदेह को दूर किया।
 
रामायण काल के मायावी लोग : रामायण काल में ऐसे कई मायावी असुर, दावन, वानर और राक्षस थे जो आश्चर्यजनकरूप से शक्तिशाली थे। जैसे..माल्यवान, सुमाली, माली, रावण, कालनेमि, सुबाहु, मारीच, कुंभकर्ण, कबंध, विराध, अहिरावण, खर और दूषण, मेघनाद, मय दानव, बालि आदि।
 
संदर्भ ग्रंथ सूची:-
1.वाल्‍मीकि रामायण।
2.रामकथा उत्‍पत्ति और विकास: डॉ. फादर कामिल बुल्‍के।
3.लंकेश्‍वर (उपन्‍यास): मदनमोहन शर्मा ‘शाही'।
4.हिन्‍दी प्रबंध काव्‍य में रावण: डॉ. सुरेशचंद्र निर्मल।
5.रावण-इतिहास: अशोक कुमार आर्य।
6. प्रमाण तो मिलते हैं: डॉ. ओमकारनाथ श्रीवास्‍तव (लेख) 27 मई 1973।
7.महर्षि भारद्वाज तपस्‍वी के भेष में एयरोनॉटिकल साइंटिस्‍ट (लेख) विचार मीमांसा 31. अक्‍टूबर 2007।
8. विजार्ड आर्ट।
9.चैरियट्‌स गॉड्‌स: ऐरिक फॉन डानिकेन।
10.क्‍या सचमुच देवता धरती पर उतरे थे डॉ. खड्‌ग सिंह वल्‍दिया (लेख) धर्मयुग 27 मई 1973।
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हिन्दू पौराणिक कथाओं के 5 बड़े खलनायक, जिनके कारण बदल गया इतिहास...

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हिन्दू धर्म में यूं तो कई ऐसा हुए हैं जिनके कारण धरती त्रस्त रही है लेकिन हमने इतिहास के महत्वपूर्ण पड़ाव के कुछ ऐसे खलनायक चुने हैं जिनकी चर्चा आज भी होती है। आओ जानते हैं ऐसे ही 5 खलनायकों के बारे में संक्षिप्त जानकारी।  
 
1.हिरण्याक्ष : हिरण्याक्ष भयंकर दैत्य था। वह तीनों लोकों पर अपना अधिकार चाहता था। हिरण्याक्ष का दक्षिण भारत पर राज था। ब्रह्मा से युद्ध में अजेय और अमरता का वर मिलने के कारण उसका धरती पर आतंक हो चला था। हिरण्याक्ष भगवान वराहरूपी विष्णु के पीछे लग गया था और वह उनके धरती निर्माण के कार्य की खिल्ली उड़ाकर उनको युद्ध के लिए ललकारता था। वराह भगवान ने जब रसातल से बाहर निकलकर धरती को समुद्र के ऊपर स्थापित कर दिया, तब उनका ध्यान हिरण्याक्ष पर गया।
 
आदि वराह के साथ भी महाप्रबल वराह सेना थी। उन्होंने अपनी सेना को लेकर हिरण्याक्ष के क्षे‍त्र पर चढ़ाई कर दी और विंध्यगिरि के पाद प्रसूत जल समुद्र को पार कर उन्होंने हिरण्याक्ष के नगर को घेर लिया। संगमनेर में महासंग्राम हुआ और अंतत: हिरण्याक्ष का अंत हुआ। आज भी दक्षिण भारत में हिंगोली, हिंगनघाट, हींगना नदी तथा हिरण्याक्षगण हैंगड़े नामों से कई स्थान हैं। उल्लेखनीय है कि सबसे पहले भगवान विष्णु ने नील वराह का अवतार लिया फिर आदि वराह बनकर हिरण्याक्ष का वध किया इसके बाद श्‍वेत वराह का अवतार नृसिंह अवतार के बाद लिया था। हिरण्याक्ष को मारने के बाद ही स्वायंभूव मनु को धरती का साम्राज्य मिला था।
 
2.महाबली : महाबली बाली अजर-अमर है। कहते हैं कि वो आज भी धरती पर रहकर देवताओं के विरुद्ध कार्य में लिप्त है। पहले उसका स्थान दक्षिण भारत के महाबलीपुरम में था लेकिन मान्यता अनुसार अब मरुभूमि अरब में है जिसे प्राचीनकाल में पाताल लोक कहा जाता था। अहिरावण भी वहीं रहता था। समुद्र मंथन में उसे घोड़ा प्राप्त हुआ था जबकि इंद्र को हाथी। उल्लेखनीय है कि अरब में घोड़ों की तादाद ज्यादा थी और भारत में हाथियों की।
 
 
शिवभक्त असुरों के राजा बाली की चर्चा पुराणों में बहुत होती है। वह अपार शक्तियों का स्वामी लेकिन धर्मात्मा था। वह मानता था कि देवताओं और विष्णु ने उसके साथ छल किया। हालांकि बाली विष्णु का भी भक्त था। भगवान विष्णु ने उसे अजर-अमर होने का वरदान दिया था। हिरण्यकश्यप के 4 पुत्र थे- अनुहल्लाद, हल्लाद, भक्त प्रह्लाद और संहल्लाद। प्रह्लाद के कुल में विरोचन के पुत्र राजा बाली का जन्म हुआ। बाली जानता था कि मेरे पूर्वज विष्णु भक्त थे, लेकिन वह यह भी जानता था कि मेरे पूर्वजों को विष्णु ने ही मारा था इसलिए बाली के मन में देवताओं के प्रति द्वेष था। उसने शुक्राचार्य के सान्निध्य में रहकर स्वर्ग पर आक्रमण करके देवताओं को खदेड़ दिया था। वह ‍तीनों लोकों का स्वामी बन बैठा था। बाली से भारत के एक नए इतिहास की शुरुआत होती है। >  
3.वृत्रासुर - यह सतयुग की बात है जब कालकेय नाम के एक का संपूर्ण धरती पर आतंक था। वह वत्रासुर के अधीन रहता था। दोनों से त्रस्त होकर सभी देवताओं ने मिलकर सोचा वृत्रासुर का वध करना अब जरूरी हो गया। इस वृत्तासुर के वध के लिए ही दधीचि ऋषि की हड्डियों से एक हथियार बनाया जिसका नाम वज्र था। वृत्रासुर एक शक्तिशाली था जिसने आर्यों के नगरों पर कई बार आक्रमण करके उनकी नाक में दम कर रखा था। अंत में इन्द्र ने मोर्चा संभाला और उससे उनका घोर युद्ध हुआ जिसमें वृत्रासुर का वध हुआ। इन्द्र के इस वीरतापूर्ण कार्य के कारण चारों ओर उनकी जय-जयकार और प्रशंसा होने लगी थी।
 
शोधकर्ता मानते हैं कि वृत्रासुर का मूल नाम वृत्र ही था, जो संभवतः असीरिया का अधिपति था। पारसियों की अवेस्ता में भी उसका उल्लेख मिलता है। वृत्र ने आर्यों पर आक्रमण किया था तथा उन्हें पराजित करने के लिए उसने अद्विशूर नामक देवी की उपासना की थी। इन्द्र और वृत्रासुर के इस युद्ध का सभी संस्कृतियों और सभ्यताओं पर गहरा असर पड़ा था। तभी तो होमर के इलियड के ट्राय-युद्ध और यूनान के जियॅस और अपोलो नामक देवताओं की कथाएं इससे मिलती-जुलती हैं। इससे पता चलता है कि तत्कालीन विश्व पर इन्द्र-वृत्र युद्ध का कितना व्यापक प्रभाव पड़ा था।
 
4.रावण : रावण एक कुशल राजनीतिज्ञ, सेनापति और वास्तुकला का मर्मज्ञ होने के साथ-साथ ब्रह्म ज्ञानी तथा बहु-विद्याओं का जानकार था। उसे मायावी इसलिए कहा जाता था कि वह इंद्रजाल, तंत्र, सम्मोहन और तरह-तरह के जादू जानता था। उसके पास एक ऐसा विमान था, जो अन्य किसी के पास नहीं था। इस सभी के कारण सभी उससे भयभीत रहते थे। एक मान्यता अनुसार असुरराज विष्णु के पार्षद जय और विजय ने ही रावण और कुंभकर्ण के रूप में फिर से जन्म लेकर धरती पर अपना साम्राज्य स्थापित किया।
 
रावण ने रक्ष संस्कृति की नींव रखी थी। रावण ने कुबेर से लंका और उनका विमान छीना। रावण ने राम की सीता का हरण किया और अभिमानी रावण ने शिव का अपमान किया था। विद्वान होने के बावजूद रावण क्रूर, अभिमानी, दंभी और अत्याचारी था। हालांकि राम या रावण के काल में और भी बहुत सारे खलनायक थे लेकिन रावण उन सभी में अग्र था।
 
5. जरासंध : भगवान कृष्ण के मामा थे कंस। वह अपने पिता उग्रसेन को राज पद से हटाकर स्वयं राजा बन बैठा था। कंस बेहद क्रूर था। उसमें असुरों, दानवों और राक्षसों जैसी प्रवृत्ति थी। कंस अपने पूर्वजन्म में 'कालनेमि' नामक असुर था जिसे भगवान विष्णु ने मारा था। कंस का श्वसुर मगथ का सम्राट जरासंध था। काल के सबसे बड़े खलनायक में से किसी एक को  तय करना मुश्किल है। कंस से बड़ा खलनायक जरासंध था। कंस तो भगवान श्रीकृष्ण को मारने के चक्कर में ही मारा गया।
 
भगवान श्रीकृष्ण को सबसे ज्यादा यदि किसी ने परेशान किया तो वह था जरासंध। वह बृहद्रथ नाम के राजा का पुत्र था और जन्म के समय दो टुकड़ों में विभक्त था। जरा नाम की राक्षसी ने उसे जोड़ा था तभी उसका नाम जरासंध पड़ा। महाभारत युद्ध में जरासंध कौरवों के साथ था। जरासंध अत्यन्त क्रूर एवं साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का शासक था। हरिवंश पुराण अनुसार उसने काशी, कोशल, चेदि, मालवा, विदेह, अंग, वंग, कलिंग, पांडय, सौबिर, मद्र, काश्मीर और गांधार के राजाओं को परास्त कर सभी को अपने अधीन बना लिया था। इसी कारण पुराणों में जरासंध की बहुत चर्चा मिलती है। जरासंध का मित्र था कालयवन।>  
 
जरासंध के कई साथी राजा थे- कामरूप का राजा दंतवक, चेदिराज, शिशुपाल, कलिंगपति पौंड्र, भीष्मक पुत्र रूक्मी, काध अंशुमान तथा अंग, बंग कोसल, दषार्ण, भद्र, त्रिगर्त आदि के राजा थे। इनके अतिरिक्त शाल्वराज, पवनदेश का राजा भगदत्त, सौवीरराज गंधार का राजा सुबल नग्नजित् का मीर का राजा गोभर्द, दरद देश का राजा आदि। भीम ने जरासंध के शरीर को दो हिस्सों में विभक्त कर उसका वध कर दिया था। 
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साष्टांग नमस्कार करने से होते है यह स्वास्थ लाभ.....

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आजकल के इस मॉडर्न ज़माने में नमस्कार करना या फिर किसी को झुककर चरण स्पर्श करना तो जैसे हमारी नयी पीढ़ी के लिए बस औपचारिकता मात्र ही रह गयी है लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो इस ज़माने में भी नमस्कार करने को किसी का सम्मान करना मानते हैं। इन्हीं में से कुछ लोग साष्टांग दंडवत प्रणाम को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं। साष्टांग नमस्कार भी नमस्कार का ही एक रूप है जिसमें शरीर के सभी अंग ज़मीन को छूते हैं। आमतौर पर इस नमस्कार को दण्डकार नमस्कार और उद्दंड नमस्कार भी कहा जाता है। यहां दंड का अर्थ होता है डंडा इसलिए इस प्रणाम को करने के लिए व्यक्ति ज़मीन पर बिल्कुल डंडे के समान लेट जाता है। 

ऐसी मुद्रा के पीछे का मतलब होता है कि जिस प्रकार ज़मीन पर गिरा हुआ डंडा बिल्कुल अकेला और मजबूर होता है वैसे ही मनुष्य भी दुखी और लाचार है। इस वजह से ही वह भगवान की शरण में आया है और उनसे मदद के लिए प्रार्थना कर रहा है। ऐसे नमस्कार करके वह ईश्वर तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश करता है। कुछ मायनों में इस नमस्कार का मतलब होता है अपने अहंकार का त्याग करना। कहते हैं जब हम खड़े होकर ज़मीन पर गिर जाते हैं तब हमें चोट लगती है, ठीक वैसे ही बैठे बैठे भी गिरने पर हम चोटिल हो जाते है किन्तु साष्टांग नमस्कार में गिरने और चोट लगने की कोई गुंजाइश नहीं होती। साष्टांग नमस्कार से मनुष्य के अंदर विनम्रता के भाव आते हैं। जब कोई दूसरा हमारा सिर झुकाता है तो इससे हमारा अपमान होता है किन्तु जब हम स्वयं अपना सिर झुकाते हैं तो वह हमारे लिए सम्मान की बात होती है।

हिंदू धर्म में नमस्कार

हिंदू धर्म में नमस्कार का बड़ा ही महत्व होता है। हम अकसर अपने से बड़ों या फिर किसी संत पुरुष के आगे झुककर उन्हें नमस्कार करते हैं। हिंदू धर्म में नमस्कार करना यानी सम्मान देना होता है। जब हम किसी के आगे अपना सिर झुकाते हैं तो वह इंसान हमारा आभार स्वीकार करता है और ईश्वर से हमारे लिए सुख और समृद्धि की कामना करता है।

कैसे करते है साष्टांग नमस्कार

साष्टांग नमस्कार में आपके शरीर के आठ अंग ज़मीन को टच करते हैं। वो आठ अंग होते हैं छाती, सिर, हाथ, पैर के पंजे, घुटने, शरीर, दिमाग और वचन। आमतौर पर यह नमस्कार पुरुष ही करते हैं।

सबसे पहले दोनों हाथ छाती से जोड़कर कमर से झुके फिर पेट के बल लेटकर दोनों हाथ ज़मीन पर टिकाएं। उसके बाद पहले दायां फिर बायां पैर पीछे की ओर ले जाकर तानकर बिल्कुल सीधे लेट जाएं। आप ऐसे लेटें कि आपकी छाती, हथेलियां, घुटने और पैरों की उंगलियाँ ज़मीन पर टिक जाएं। अब दोनों आँखें बंद कर लें और सच्चे मन से ईश्वर को याद करें।

क्या औरतें साष्टांग नमस्कार कर सकती हैं?

शास्त्रों के अनुसार औरतों को यह नमस्कार करने की मनाही होती है क्योंकि इस मुद्रा में उनके स्तन और गर्भाशय ज़मीन को छूते हैं। ज़ाहिर है महिलाएं बच्चे को स्तनपान कराती है और उनके गर्भ में नया जीवन पलता है इसलिए इनके इन अंगो को ज़मीन पर स्पर्श नहीं कराना चाहिए।

ऐसे में महिलाएं पंचांग नमस्कार कर सकती हैं। इस नमस्कार में स्त्रियों को अपनी हथेलियों के साथ-साथ घुटनों को भी ज़मीन से छूना पड़ता है।

साष्टांग प्रणाम करने के स्वास्थ्य लाभ

साष्टांग नमस्कार केवल ईश्वर की शरण में जाकर उन्हें याद करना ही नहीं होता बल्कि इसके कई स्वास्थ्य लाभ भी होते हैं। जी हाँ, इस नमस्कार से हमारे स्पाइन में लचीलापन और सुधार आता है। इससे मांसपेशियां पूरी तरह से खुल जाती हैं साथ ही पैरों, कन्धों और माँसपेशियों में मज़बूती भी आती है। इस मुद्रा से मनुष्य के अंदर सकारात्मकता आती है और उसके अहंकार का भी नाश हो जाता है। इतना ही नहीं वह खुद को ज़मीन से जुड़ा हुआ भी महसूस करने लगता है।

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4 वेद और 3 देव का जो अर्थ है वही गायत्री मंत्र है....

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गायत्री वेदजननी गायत्री पापनाशिनी।
गायत्र्या: परमं नास्ति दिवि चेह च पावनम्।। (शंखस्मृति)
 
अर्थात्‘गायत्री वेदों की जननी है। गायत्री पापों का नाश करने वाली है। गायत्री से अन्य कोई पवित्र करने वाला मंत्र स्वर्ग और पृथ्वी पर नहीं है।’
 
सृष्टिकर्ता ब्रह्मा से लेकर आधुनिक काल तक ऋषि-मुनियों, साधु-महात्माओं और अपना कल्याण चाहने वाले मनुष्यों ने का आश्रय लिया है। यह मंत्र यजुर्वेद व सामवेद में आया है लेकिन सभी वेदों में किसी-न-किसी संदर्भ में इसका बार-बार उल्लेख है। स्वामी करपात्रीजी के शब्दों में गायत्री मंत्र का जो अभिप्राय है वही वेदों का अर्थ है।
 
गायत्री का शाब्दिक अर्थ है ’गायत् त्रायते’ अर्थात् गाने वाले का त्राण करने वाली। गायत्री मंत्र गायत्री छन्द में रचा गया अत्यंत प्रसिद्ध मंत्र है। इसके देवता सविता हैं और ऋषि विश्वामित्र हैं। 
 
मंत्र
 
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
 
 
गायत्री मंत्र से पहले ॐ लगाने का विधान है। इसे प्रणव कहा जाता है। प्रणव परब्रह्म परमात्मा का नाम है। ‘ओम’ के अ+उ+म् इन तीन अक्षरों को ब्रह्मा, विष्णु और शिव का रूप माना गया है। गायत्री मंत्र से पहले ॐ के बाद भू: भुव: स्व: लगाकर ही मंत्र का जप करना चाहिए। ये गायत्री मंत्र के बीज हैं। बीज मंत्र का जप करने से ही साधना सफल होती है। अत: ॐ और बीजमंत्र सहित गायत्री मंत्र इस प्रकार है... 
 
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
 
अर्थ : ‘पृथ्वीलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक में व्याप्त उस श्रेष्ठ परमात्मा (सूर्यदेव) का हम ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धि को श्रेष्ठ कर्मों की ओर प्रेरित करें।’
 
 
प्रात:काल गायत्री मंत्र का जप खड़े होकर तब तक करें जब तक सूर्य भगवान के दर्शन न हो जाएं। संध्याकाल में गायत्री का जप बैठकर तब तक करें जब तक तारे न दिख जाए। गायत्री मंत्र का एक हजार बार जाप सबसे उत्तम माना गया है। > गायत्री मंत्र तीनों देव, ब्रह्मा, विष्णु और महेश का सार है। गीता में भगवान् ने स्वयं कहा है ‘गायत्री छन्दसामहम्’ अर्थात् गायत्री मंत्र मैं स्वयं ही हूं।>
सच तो यह है कि अन्य किसी भी मंत्र का जाप करने में या देवता की उपासना में तभी सफलता मिलती है, जब पहले गायत्री मंत्र द्वारा उस मंत्र या देवता को जाग्रत कर लिया जाए। कहा भी है-
 
यस्य कस्यापि मन्त्रस्य पुरश्चरणमारभेत्।
व्याहृतित्रयसंयुक्तां गायत्रीं चायुतं जपेत्।।
नृसिंहार्कवराहाणां तान्त्रिक वैदिकं तथा।
बिना जप्त्वातु गायत्रीं तत्सर्वं निष्फल भवेत।।
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