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Monday, 13 April 2026

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गुरु को दिया यह उपहार होगा आपके लिए शुभ.....

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27 जुलाई : गुरु पूर्णिमा पर जब आप अपने लेने जाएं, तब उनका पूजन करके राशि अनुसार भेंट दें, तो आपको उनका आशीर्वाद फलीभूत होगा। उनका आशीर्वाद उन्नति व समृद्धि प्रदान करेगा।
 
मेष : अन्न के साथ मूंगा दान करें।
 
वृषभ : चांदी का दान करें।
 
मिथुन : शॉल का दान करें।
 
कर्क : चावल दान करें।
 
सिंह : पंच धातु से बनी सामग्री दान करें।
 
कन्या : डायमंड का दान करें।
 
तुला : कम्बल का दान करें।
 
वृश्चिक : माणक का दान करें।
 
धनु : स्वर्ण का दान करें।
 
मकर : पीला वस्त्र दान करें।
 
कुंभ : सफेद मोती दान करें।
 
मीन : हल्दी के साथ चने की दाल दान करें।
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 विज्ञान या चमत्‍कार! जगन्नाथ मंदिर से जुड़े ये रहस्य..... 




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हिन्दू धर्म के बेहद पवित्र स्थल और चार धामों में से एक जगन्नाथ पुरी की धरती को भगवान विष्णु का स्थल माना जाता है। जगन्नाथ मंदिर से जुड़ी एक बेहद रहस्यमय कहानी प्रचलित है, जिसके अनुसार मंदिर में मौजूद भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के भीतर स्वयं ब्रह्मा विराजमान हैं। भगवान जगन्नाथ को विष्णु का 10वां अवतार माना जाता है,।पुराणों में जगन्नाथ धाम की काफी महिमा है, इसे धरती का बैकुंठ भी कहा गया है। यहां भगवान जगन्नाथ बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं। जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और उनकी बहन सुभद्रा की पूजा की जाती है।

मंदिर में भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा सबसे दाई तरफ स्थित है। बीच में उनकी बहन सुभद्रा की प्रतिमा है और दाई तरफ उनके बड़े भाई बलभद्र (बलराम) विराजते हैं। हर साल ओडिशा प्रान्त के पुरी जिले में भगवान 'जगन्नाथ जी' की रथयात्रा निकाली जाती है। इस साल 14 जुलाई को जगन्‍नाथ जी की रथ यात्रा शुरु होगी। ये परंपरा पिछले लगभग 500 सालों से चली आ रही है। इस रथ यात्रा से कई तरह की मान्यताएं जुड़ी हैं। इसी के साथ इस यात्रा और खुद जगन्नाथ मंदिर को लेकर कई तरह चौंकाने वाली बातें जुड़ी हैं। जानिए इस यात्रा और मंदिर से जुड़े कुछ चौंकाने वाले रहस्य...

मंदिर से जुड़े हैरान करने वाले रहस्य

फैक्‍ट 1 : मंदिर के पास हवा की दिशा भी हैरान करती है। ज्यादातर समुद्री तटों पर हवा समंदर से जमीन की तरफ चलती है। लेकिन, पुरी में ऐसा बिल्कुल नहीं है यहां हवा जमीन से समंदर की तरफ चलती है और यह भी किसी रहस्य से कम नहीं है। आम दिनों में हवा समंदर से जमीन की तरफ चलती है। लेकिन, शाम के वक्त ऐसा नहीं होता है।

फैक्‍ट 2 :  जगन्नाथ मंदिर 4 लाख वर्गफुट में फैला है और इसकी ऊंचाई लगभग 214 फुट है। मंदिर की इतनी ऊंचाई के कारण ही पास खडे़ होकर भी आप गुंबद नहीं देख सकते।

फैक्‍ट 3 :  विज्ञान के अनुसार, किसी भी चीज पर सूरज की रोशनी पड़ने पर उसकी छाया जरूर बनती हैं। मगर इस मंदिर के शिखर की कोई छाया या परछाई दिखती ही नहीं है। फैक्‍ट 4  जगन्नाथ मंदिर के ऊपर कोई भी पक्षी आज तक उड़ता हुआ नहीं देखा गया है। मंदिर के शिखर के पास पक्षी या कोई भी चिड़ियां उड़ते हुए नहीं दिखाई दिए है। यहां तक मंदिर के उपर विमान उड़ाना भी‍ नि‍षेध है।   

फैक्‍ट 5 : जगन्‍नाथ मंदिर के रसोईघर को दुनिया का सबसे बड़ा रसोईघर माना जाता है। मान्यता है कि कितने भी श्रद्धालु मंदिर आ जाए, लेकिन अन्न कभी भी खत्म नहीं होता। मंदिर के पट बंद होते ही प्रसाद भी खत्म हो जाता है।

फैक्‍ट 6 : मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए 7 बर्तन एक-दूसरे के ऊपर रखे जाते हैं। यह प्रसाद मिट्टी के बर्तनों में लकड़ी पर ही पकाया जाता है। इस दौरान सबसे ऊपर रखे बर्तन का पकवान पहले पकता है फिर नीचे की तरफ से एक के बाद एक प्रसाद पकता जाता है।

फैक्‍ट 7 : इस मंदिर के शिखर पर लगा हुआ सुदर्शन चक्र मंदिर की शान है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि आप उसे कहीं से भी देख लें यह आपको सीधा ही नजर आएगा। अष्टधातु से निर्मित यह चक्र बेहद पवित्र माना जाता है। करीब 200 साल पहले इसे मंदिर में स्‍थापित किया गया था जो इसको स्‍थापित करने की तकनीक आज भी रहस्‍य है।

फैक्‍ट 8 : मंदिर के सिंहद्वार में प्रवेश करने के बाद मंदिर के अंदर समंदर की कोई भी आवाज सुनाई नहीं देती। इसके अलावा मंदिर के ऊपर लगा ध्वज भी हवा की विपरित दिशा में लहराता रहता है।

फैक्‍ट 9 :  इसके अलावा मंदिर में हमेशा 20 फीट का ट्रायएंगुलर ध्वज लहराता है इसे रोजाना बदला जाता है। एक पुजारी मंदिर के 45 मंजिला शिखर पर स्थित झंडे को रोज बदलता है।इसे बदलने का जिम्मा चोला परिवार पर है वह इसे 800 साल से करती चली आ रही है। ऐसी मान्यता है कि अगर ध्वजा रोज नहीं बदला गया, तो मंदिर 18 सालों तक अपने आप बंद हो जाएगा।

फैक्‍ट 10 : यहां जगन्नाथ जी के साथ के मंदिरों में भाई बलराम और बहन सुभद्रा भी हैं। तीनों की मूर्तियां काष्ठ की बनी हुई हैं। बारहवें वर्ष में एक बार प्रतिमा नई जरूर बनाई जाती हैं, लेकिन इनका आकार और रूप वही रहता है। कहा जाता है कि मूर्तियों की पूजा नहीं होती, केवल दर्शनार्थ रखी गई हैं। पुरानी मूर्तियों को दफना दिया जाता है कहती है ये मूर्तियां अपने आप विघटित हो जाती है।

फैक्‍ट 11 : वर्तमान में जो मंदिर है वह 7वीं सदी में बनवाया था। हालांकि इस मंदिर का निर्माण ईसा पूर्व 2 में भी हुआ था। यहां स्थित मंदिर 3 बार टूट चुका है। 1174 ईस्वी में ओडिसा शासक अनंग भीमदेव ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था। मुख्‍य मंदिर के आसपास लगभग 30 छोटे-बड़े मंदिर स्थापित हैं।

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कई शिवलिंग वाली पांच तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं....

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नदी में पानी के बीच चट्टानों पर कई शिवलिंग वाली पांच तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं। इन तस्वीरों को लेकर दावा किया जा रहा है कि इतिहास में पहली बार लाखों शिवलिंग एक साथ देखे गए।
 
क्या है इन तस्वीरों में..
 
वायरल तस्वीरों में नदी के बीच चट्टानों पर शिवलिंग और नंदी की मूर्तियां साफ नजर आ रही हैं। इन तस्वीरों के साथ मैसेज लिखा गया है कि ‘भारत के इतिहास में पहली बार कर्नाटक में शिवकाशी नदी में पानी कम होने पर दिखे लाखों शिवलिंग। शेयर करना ना भूलें। हर हर महादेव’।
 

क्या है सच्चाई..
 
जब हमने पड़ताल शुरू की तो पता चला कि यह तस्वीरें तो असली हैं, लेकिन इन तस्वीरों को लेकर किया जा रहा दावा झूठा है कि इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है। आइए, अब जानते हैं कि यह कौन-सी जगह है, जहां पर इतने सारे शिवलिंग हैं..
 
कर्नाटक के उत्तर कन्नडा जिले में सिरसी से 14 किलोमीटर दूर स्थित यह जगह सहस्रलिंग के नाम से प्रसिद्ध है। यहां बहने वाली शालमला नदी में हजारों की संख्या में शिवलिंग मौजूद हैं। ये सभी शिवलिंग चट्टानों पर बने हुए हैं। शिवलिंग के अलावा इन चट्टानों पर नंदी, सर्प आदि की आकृतियां भी बनी हुई हैं।
 
शालमला नदी में जब पानी रहता है, तो उस समय यहां मौजूद शिवलिंग नहीं दिखाई देते हैं। लेकिन, जैसे-जैसे पानी का स्तर कम होता है, तो नदी में हजारों की संख्या में मौजूद शिवलिंग दिखाई देने लगते हैं। इस अद्भुत नजारे को देखने के लिए शिव भक्‍तों का यहां तांता लगा रहता है।
 
मान्यताओं के अनुसार, इन शिवलिंगों का निर्माण राजा सदाशिवराय वर्मा ने 16वीं शताब्दी में कराया था। राजा सदाशिवराय भगवान शिव के बड़े भक्त थे और वे भगवान शिव की अद्भुत रचना का निर्माण करवाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने शालमला नदी में मौजूद चट्टानों पर भगवान शिव और उनके प्रियजनों की हजारों आकृतियां बनवा दीं। नदी के बीच स्थित होने के कारण सभी शिवलिंगों का अभिषेक खुद शालमला नदी करती है।
 
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा ‍‍कि कुछ ऐसे ही शिवलिंग कंबोडिया के प्रसिद्ध अंगकोर वाट मंदिर से कुछ दूरी पर भी मौजूद हैं। इस मंदिर से करीब 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित केब्ल स्पीन नामक स्थान पर पत्थरों पर देव आकृतियां हैं।
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