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हिंदू परंपराओं में सूर्य को जल देने के कई फायदे बताए गए हैं। लेकिन ये होते तभी हैं, जब ये अर्घ्य पूरी विधि से दिया जाए। सूर्य देव को जल अर्पित करते समय कई वास्तु दोषों का भी ध्यान रखना जरुरी होता है। क्योंकि अगर थोड़ी भी चूक हो गई तो इसका फल जल चढ़ाने वाले जातक नहीं मिलता है, आइए जानते है कि सूर्य को जल अर्पित करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और क्यूं?

किसी भी व्यक्ति की कुंडली में मौजूद सूर्य ग्रह को पिता या ज्येष्ठ का दर्जा दिया जाता है। जिस जातक की कुंडली में सूर्य की स्थिति सही ना हो या उनका ताप अधिक हो तो उसे सूर्य को जल चढ़ाने की सलाह दी जाती है।

सूर्य देव को जल चढ़ाने का सबसे पहला नियम यह है कि उन्हें प्रात: 8 बजे से पूर्व ही अर्घ्य दे देना चाहिए। नियमित क्रियाओं से मुक्त होकर और स्नान करने के बाद ही ऐसा किया जाना चाहिए।

सूर्य को जल देने के लिए शीशे, प्लास्टिक, चांदी... आदि किसी भी धातु के बर्तन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। सूर्य को चल देते समय केवल तांबे के पात्र का ही प्रयोग करें और नियमित उपयोग में लेने वाले तांबे के बर्तन का उपयोग न करें। सूर्यदेव को जल अर्पित करने के लिए अलग से ही तांबे की धातु वाला पात्र रखें।

सूर्य को जल चढ़ाने से अन्य ग्रह भी मजबूत होते हैं। कुछ लोग सूर्य को अर्घ्य देते समय जल में गुड़ या चावल भी मिला लेते अहिं। ये अर्थहीन है, इससे प्रभाव कम होने लगता है।

सूर्य को जल देते समय आपका मुख पूर्व दिशा की ओर ही होना चाहिए। अगर कभी पूर्व दिशा की ओर सूर्य नजर ना आएं तब ऐसी स्थिति में उसी दिशा की ओर मुख करके ही जल अर्घ्य दे दें।

सूर्य देव को जल अर्पित करते समय दायें हाथ को आगे कर के जल चढ़ाएं। बायें हाथ से जल अर्पित करने से पुण्य नहीं मिलता है।

अर्घ्य देते समय हाथ सिर से ऊपर होने चाहिए। ऐसा करने से सूर्य की सातों किरणें शरीर पर पड़ती हैं। सूर्य देव को जल अर्पित करने से नवग्रह की भी कृपा रहती है। इसके बाद तीन परिक्रमा करें।

सूर्य को जल देते समय आप उसमें पुष्प और अक्षत (चावल) मिला सकते हैं। साथ ही साथ अगर आप सूर्य मंत्र का जाप भी करते रहेंगे तो आपको विशेष लाभ प्राप्त होगा।

जल चढ़ाते वक्त सूर्य को सीधे ना देंख कर बल्कि लोटे से जो जल बह रहा हो, उसकी धार में ही सूर्य के दर्शन करें।

लाल वस्त्र पहनकर सूर्य को जल देना ज्यादा प्रभावी माना गया है, जल अर्पित करने के बाद धूप, अगबत्ती से पूजा भी करनी चाहिए।

मनोवांछित फल पाने के लिए प्रतिदिन इस मंत्र का उच्चारण करें- ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्रकिरणराय मनोवांछित फलम् देहि देहि स्वाहा।।
रायपुर । भूतेश्वर महादेव राजधानी रायपुर से 90 किमी दूर और गरियाबंद जिला मुख्यालय से 3 किमी दूर ग्राम मरौदा में पहाड़ियों के बीच स्थित है भूतेश्वर महादेव का शिवलिंग। इसे विश्व का सबसे बड़ा शिवलिंग कहा जाता है। यह जमीन से लगभग 85 फीट उंचा एवं 105 फीट गोलाकार है। आज से सैकडों वर्ष पूर्व जमींदारी प्रथा के समय पारागांव निवासी शोभासिंह जमींदार शाम को जब अपने खेत मे घूमने जाते थे, तो उन्हें खेत के पास एक विशेष आकृति नुमा टीले से सांड के हुंकारने (चिल्लाने) एवं शेर के दहाड़नें की आवाज आती थी।

गांव वालों के साथ खोजने पर वहां कोई शेर या सांड नजर नहीं आया। जिसके इस टीले के प्रति लोगों की श्रद्धा बढ़ गई। आज इस शिवलिंग में प्रकृति प्रदत जललहरी भी दिखाई देती है। जो धीरे धीरे जमीन के उपर आती जा रही है। यह भी किंवदंती हैं कि इनकी पूजा छुरा नरेश बिंद्रनवागढ़ के पूर्वजों द्वारा की जाती रही हैं। बताया जाता है कि शिवलिंग पर एक हल्की सी दरार भी है, जिसके कारण लोग इसे अर्धनारीश्वर का स्वरूप भी मानते हैं। गरियाबंद जिले के भूतेश्वर महादेव में पूरे सावन मेले जैसा माहौल रहता है। मंदिर समिति और ग्रामीण इसकी तैयारी में जुटे हुए है। यहां पूरे प्रदेश सहित पड़ोसी जिला ओडिसा से बड़ी संख्या में भक्त आकर शिवलिंग में अभिषेक करते है। मंदिर परिसर के आसपास पूजा सामान की दुकानें सज गई है।
::/fulltext::नई दिल्ली। 104 साल बाद 27 जुलाई यानी शुक्रवार रात को सदी का सबसे बड़ा चंद्र ग्रहण पड़ने जा रहा है। गुरु पूर्णिमा की रात पड़ने वाला साल का यह दूसरा ग्रहण देशभर में दिखाई देगा। इसकी अवधि करीब 3 घंटे 55 मिनट की रहेगी। इस तरह का खग्रास चंद्रग्रहण इससे पहले सन् 1914 में पड़ा था, जो भारत समेत कई अन्य देशों में देखा गया था। जानकारों के मुताबिक, चंद्रग्रहण को सामान्य तरीके से देखा जा सकता है और सूर्य ग्रहण की तरह इसमें आंखों को किसी तरह का नुकसान होने की आशंका नहीं रहती है। भारत को लेकर कहा जा रहा है कि पूरे देश में इस खगोलीय घटना को स्पष्ट देखा सकता है। भारत में शुक्रवार रात 11.44 बजे से चंद्रग्रहण शुरू होगा। रात करीब 1 बजे पूर्ण चंद्रग्रहण नजर आएगा। 1.15 बजे से 2.43 बजे तक ब्लड मून नजर आएगा। शनिवार सुबह 4.58 बजे चंद्रग्रहण समाप्त हो जाएगा।
होगा चंद्रग्रहण, नजरें होंगी मंगल पर
मंगल इन दिनों हमारे सर्वाधिक करीब आ पहुंचा है। यह संयोग पिछले 60 हजार साल में दूसरी बार बनने जा रहा है। इससे पहले वर्ष 2003 में मंगल हमारे सर्वाधिक नजदीक पहुंचा था। आर्यभटट् प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एरीज) के वरिष्ठ खगोलीय वैज्ञानिक डॉ. शशिभूषण पांडे के अनुसार यह तीनों घटनाएं खगोलीय दृष्टि से बेहद खास हैं। वहीं वैज्ञानिक नजरिए से मंगल ग्रह अध्ययन के लिए खास होगा। मंगल मिशन के लिए भावी योजनाओं के अलावा इन दिनों मंगल के वातावरण पर छाए धूल के गुबार का अध्ययन किए जाने में मदद मिलेगी।
इसलिए कहते हैं 'ब्लड मून'
पूर्ण चंद्रग्रहण के दौरान चंद्रमा जब पृथ्वी की छाया से होकर गुजरता है तो वह नाटकीय रूप से चमकीले नारंगी रंग से लाल रंग का हो जाता है। यही कारण है कि इस अवधि में उसे 'ब्लड मून' कहा जाता है।
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